Friday, 24 October 2014

साँस की बीमारी



कम्बक्त इस शहर को
रात् को जागने की बीमारी है
कुछ साल मूज़े भी यह बीमारी लग गयि
 अब तो कम्हुव
फिरबी काबी काबी
वैरुस की तरह
लगी रहती
इसके इलाज  के   लिए
जंगली की जारी बूटी
लेने जाता हूँ
यहाँ इलाज बहुत महँगी है
और मेरा आमदानी
बहुत क्म है
इसका इलाज बी करवानी है
वहाँ तो कम से कम
साँस लेने का बीमारी तो नहीं


(३-१-१३)

Sunday, 5 October 2014

चाय पे बातचीत



इस शहर में
चाय में दुबे चिन्तक
गरम चाय में
टंडी सांस
टेबल पर माता
जेब में डलता
कोटा सिक्का

बातों बातों में
चाय खतम होगई...
हम ने एक चाय
और एक एम्टी
आर्डर की
उसने कहा
चार चाय!

शहर में हर बात
युहिं बदल जाति
जीना भी
चौराही  पर पुतलों की तरह खड़े होना सिकला देती

काम काज की तलाश में
बीद ज्यादा हो गई
सड़क ने अपना तन चौड़ा कर लिय
खयाल को सांस लेना भी
एक गुटन सी होजाती

एम्टी शहर में
चाहत भी चाय की तरह
खूब बिक्जाती



Friday, 5 September 2014

घोसला

जिन्दगी में बिजली का उत्पादन कम हो गया
अब चिड़ियों का जोडी बिजली के तार पर दिखाई नही देते
हमजोली से मिल कर रहने का घर में अंधेरा चागया
बहुत दिन के बाद बस में सफ़र करते हुए समय में यह खयाल मेरे मन में टहल रहे
कुछ सड़कों से गुजरते वक़्त पर
वही पुराने घर, 
शापिंग माल्स के बीच में सुने खांडार की तरह पड़े हुवे
मेरे बचपन के गलियों के दरवाजे से चली हवा
बस के किडिकी से नज़र लड़ाकर
मेरे कान बरदेती
चलो अब से पैदल घूम ने का आदत डाल लेता हूँ
उन दरवाजों को खोल कर
दीवार में खैद हुए अल्मारोंसे
मेरा पेहला पासपोर्ट फोटो तो लेलेता हूँ
वही तो अभीबी
हम सब दोस्तों का
हर एक का
वान्टेड पोस्टर सा रहगया
यही तो एक चीज
बिना टिके नोट की तरह
हर एक बटवों में बटवारा होगया
बिचड़ ते समय में
इस पर लिखी गई सन्देश को
मेरा नज़र का रोशनी  बनाकर
बिजली की तार पर लगादून्गा
कम से कम मेरा दिल
चिड़ियों की बातों का किराया मखान बंनजाएगा

(श्रवन,आरिफ़,वकील)


(27-6-14)

Thursday, 22 May 2014

काला लिबास



मुझ से पहले ही

छत पर चाँद 

अपना चांदनी  का बिस्तर पहलाए

रातभर हम दोनोँ की बातचीत

न वक्त का कयाल ता, न खुद का

कल से चाँद छुट्टी पर


मै घर से निकल कर

घर को ढूंड रहा हूँ

जाते,जाते चाँद

अपना काला पोशाक

मुझ को पहना कर चला गया

अब मै

इसी लिबाज़ में कहता हूँ

(5-6-96,राजमंद्री)