Tuesday, 15 January 2013

काल चोर


कुछ क्वाइश 
अधूरे  रह्ते 
क्वाबों की तरह
बार बार दौराते नहीं 
बिछड़े हुवे दोस्त जैसे
याद बी नहीं आते 
यह सब क्यालेन्दर  में 
बदलते हुवे
तारिक है  
हर बार
साल गुजर जाती 
बुली   हुई 
वादों को 
फिरसे   दिखलाकर   

Friday, 4 January 2013

सूखा


तालाब के किनारे
मूम  फल्ली खाते हुवे
वक़्त  गुजर ताता
धीरे धीरे 
तालाब सूखगया
छट  पटी
बाते बिकरगए
तन्हाई के खम्बे
जैसे मखान बनगए
मुलाखात  का वक़्त 
सूख गाया
बातें बाँध ने वाली 
तार  नहीं है
 हम दोनों  के बीच 
दागे  की दास्तान अलग है
(--१३)