Thursday, 22 May 2014

काला लिबास



मुझ से पहले ही

छत पर चाँद 

अपना चांदनी  का बिस्तर पहलाए

रातभर हम दोनोँ की बातचीत

न वक्त का कयाल ता, न खुद का

कल से चाँद छुट्टी पर


मै घर से निकल कर

घर को ढूंड रहा हूँ

जाते,जाते चाँद

अपना काला पोशाक

मुझ को पहना कर चला गया

अब मै

इसी लिबाज़ में कहता हूँ

(5-6-96,राजमंद्री)


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