मुझ से पहले ही
छत पर चाँद
अपना चांदनी का बिस्तर पहलाए
रातभर हम दोनोँ
की बातचीत
न वक्त का कयाल
ता, न खुद का
कल से चाँद छुट्टी
पर
मै घर से निकल कर
घर को ढूंड रहा
हूँ
जाते,जाते चाँद
अपना काला पोशाक
मुझ को पहना कर
चला गया
अब मै
इसी लिबाज़ में
कहता हूँ
(5-6-96,राजमंद्री)
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